यूपी में भ्रष्टाचाऱ की जांच करने वाली एजेंसियों सुस्त काले कुबेरों को चांदी,योगी जी इनपर कब होगी कार्रवाई

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अशोक कुमार गुप्ता । प्रदेश में कौन सा टैक्स बढ़ाया जाए यूपी सरकार को उसके लिए जनादेश नही मिला है । इन टैक्स को जो भ्र्ष्ट ब्यूरोक्रेट,इंजीनियर,नेता और ठेकेदार लूट कर अपने ठिकानों पर छुपाए है उसको निकालकर सरकारी खजाने में जमा कराने के लिए जनादेश मिला है । योगी सरकार को देर किए बिना इन काले कुबेरों के ठिकानों पर वीडियो ग्राफी के साथ छपेमारी करे तो राज्य का खजाना लबालब भर जाएगी ।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक इंटरव्यू मुझे याद है उन्होंने  भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सवाल का जबाब दिया कि जब गंगा का उदगम स्थल यानी( शीर्ष स्थल ) से गंगा साफ़ रहेगी तभी निर्मलता की बात कर सकते है । उन्होंने उस पत्रकार का सवाल का जबाब देते हुए कहा था ।  कि आप इस सिस्टम में  भ्रष्टाचार पर काबू कैसे पाएंगे ? उस समय यह बात कही थी । जनता मोदी पर विश्वास करती है उम्मीद भी रखती है तभी तो यूपी में बीजेपी को प्रचण्ड बहुमत की सरकार बनी ।

इनकम टैक्स  के तबड़तोड़ छपेमारी से जिस तरह निर्माण निगम से लेकर नोएडा अथॉरिटी के इंजीनियरी के घर से अकूत सम्पत्ति बरामद हुआ । उससे ऐसा लग रहा है कि यूपी सरकार अपनी एजेंसियों को भी एक्टिव करके भ्रष्टाचार  के खिलाफ छपेमारी काले कुबेरों के ठिकानों पर शुरू कर दे जो यूपी सबसे अमीर राज्य बन जाएगा ।विकास के लिए जो भारत सरकार धन उपलब्ध कराती थी, यूपी सरकार जो टैक्स लेती थी उसका चहेतों में किस तरह बाँटा जाता था अब योगी सरकार में देखने को मिल रहा है । yogi small

भ्रष्टाचार के प्रति या प्रदेश के हित के लिए  योगी सरकार काम करना चाहती है तो उसे यूपी सरकार की जांच एजेंसियों को दुरुस्त और  मजबूत करके जितने काले कुबेर अधिकारी और इंजीनियर प्रदेश में मलाईदार पद पर कार्यरत थे जिन्होंने मोटी रकम देकर सेवा विस्तार पर जमे थे उनके ठिकानों पर छपेमारी की कार्रवाई शुरू करे । जो बदनाम ब्यूरोक्रेट,नेता ,इंजीनियर और ठेकेदार है उनकी हरकतों पर नजर रखी जाए । योगी सरकार को अब इन सिंडिकेट को और देर तक छोड़ना नही चाहिए ।

भ्रष्टाचार का प्रवाह ऊपर से नीचे की तरफ होता है। बहते झरने की तरह। यह बात हर प्रबुद्ध व्यक्ति जानता-समझता है। झरने के तल को साफ कर हम झरने को शुद्ध नहीं कर सकते। उसके लिए तो झरने के निकास स्थल से हमें सफाई अभियान शुरू करना होगा। अगर देश का शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व भ्रष्टाचार-मुक्त होगा तो वह नौकरशाही और नीचे के भ्रष्टाचार पर भी रोक लगा सकेगा। यह प्रक्रिया नीचे से ऊपर की तरफ कारगर नहीं हो सकती। इसलिए बड़े-बड़े भव्य मंचों से जो लोग भ्रष्टाचार मिटाने की बातें करते हैं, उन्हें और उनके करीब के लोगों को भ्रष्टाचार से पूरी तरह मुक्त होना होगा।

कुछ लोगों की राय है कि हमारे देश में भ्रष्टाचार की सजा बहुत कम है। इसलिए भ्रष्टाचार में संलिप्त व्यक्ति जरा भी डरता नहीं। लंबी कानूनी लड़ाई के बाद दो-चार वर्ष की सजा हो भी गई तो क्या गम है? भारतीय दंड विधान में कोर्ट के पेशकार की सौ पचास रुपए की रिश्वत लेने की सजा और करोड़ों का घोटाला करने की सजा लगभग एक है। सरकार में बैठे लोगों के लिए तो सजा इतनी काफी समझी जाती है कि वे अपने पद से इस्तीफा दे दें। लेकिन यह काफी नहीं। एक करोड़ से अधिक के भ्रष्टाचार के लिए उम्रकैद की सजा होनी चाहिए।

हम भ्रष्टाचार को अत्यंत सीमित अर्थ में ही लेते हैं। उसे भादवि की धाराओं से परिभाषित करने की हमारी आदत है। लेकिन हमें यह समझना होगा कि भ्रष्टाचार सिर्फ वह नहीं, बहुत-सी बातें भ्रष्टाचार ही हैं, लेकिन कानूनी दायरे में नहीं आतीं।

उन्हें हम कानून-सम्मत भ्रष्टाचार कह सकते हैं। उदाहरण के लिए, जब लाखों लोग मुंबई के फुटपाथों पर जीते हैं, तब जनप्रतिनिधियों का आलीशान बंगलों में रहना भ्रष्टाचार ही है। सरकार बनाने के लिए विधायकों को रिश्वत देना अपराध है, लेकिन मंत्रिपद का लालच या बोर्ड निगम का अध्यक्ष बनाने का सौदा अपराध नहीं! न्यूनतम मजदूरी हम एक सौ बीस रुपए तय करते हैं तो छठे वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करना कानूनसम्मत भ्रष्टाचार का ही एक रूप है। इसलिए कानून की धाराओं के अनुसार जो भ्रष्टाचार हो रहे हैं, उन पर रोक लगना तो जरूरी है ही, कानूनसम्मत भ्रष्टाचार पर भी रोक लगना जरूरी है। चूंकि हम यह सवाल नहीं उठाते, इसलिए आम जनता, कहिए गरीब जनता, भ्रष्टाचार-विरोधी लड़ाई से निर्लिप्त रह जाती है।